महात्मा हंसराज के अनुसार शैक्षिक प्रक्रिया में अध्यापक की भूमिका का मूल्यांकन
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Author(s):
DR. SATNAM SINGH
Vol - 6, Issue- 7 ,
Page(s) : 110 - 114
(2015 )
DOI : https://doi.org/10.32804/IRJMSH
Abstract
वैदिक शिक्षा व्यवस्था में गुरू को ईश्वर से प्रथम पूजनीय माना गया है, क्योंकि वह ईश प्राप्ति के मार्ग को प्रशस्त करता है। महात्मा हंसराज का व्यक्तित्व आदर्श शिक्षक, आदर्श प्रशासक व आदर्श मानव के रूप में एक कीर्तिमान मार्गदर्शक उदाहरण बन गया। महर्षि दयानंद की भाँति महात्मा हंसराज भी छात्रों में अध्यापक के दर्शन करते हैं, जैसा अध्यापक होगा वैसा ही छात्र होगा। वे उसे समाज में सर्वाधिक प्रतिष्ठापूर्ण स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं तथा सबको उनके समान कर्म करने को प्रोत्साहित करते हैं। वस्तुतः प्रत्येक छात्र माता के पश्चात् अच्छे गुण शिक्षक से ही सीखता है। वे कहते हैं- विद्वान अध्यापक का यही आवश्यक कर्म है कि सब मनुष्यों को अविद्या और अधर्माचरण से अलग कर विद्वान, धार्मिक बनाकर उनको दुःख बन्धन से छुड़ाना। महात्माजी के विचारों को आज के समाकालिक शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण आवश्यकता है। शिक्षकों से कर्तव्यबोध, व्यावसायिक निष्ठा, समर्पणशीलता, उत्तम आचरण, अनुशासित जीवन तथा छात्रों वसमाज के प्रति दायित्वों का निर्वहन करने की भावना रखने की अपेक्षा रखते थे क्योंकि आपाधापी युग में महात्मा हंसराज जैसे महात्मा के विचारों के जीवन ज्योति की हर मानव को आवश्यकता है।
- दयानन्द, स्वामी व्यवहार भानू पृ. 9, 17
- दयानन्द, स्वामी, सत्यार्थ प्रकाश पृ. 33
- हंसराज, महात्मा-वेदामृत, डी.ए.वी. प्रकाशन नई दिल्ली, पृ. 61
- दयानन्द, स्वामी, यजुर्वेद अ. 31 मं. 21 पृ. 253
- तपोनिधि श्री महात्मा हंसराज सुरभित उद्यान पृ. 145
- दयानन्द, स्वामी, ऋग्वेद मं. 1 सू. 40 मं. पृ. 61
- दयानन्द, स्वामी, ऋग्वेद मं. 1 सू. 164 में 52 पृ. 217
- अमृत वर्षा पृ. 42
- मारवा, सोमनाथ-महात्मा हंसराज लाईफ फिलोसफी एण्ड एचिवमेन्ट, डी.ए.वी. प्रकाशन, नई दिल्ली पृ. 88
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