महिला अधिकारों की अवधारणा, अर्थ और विभिन्न नारीवादी सिद्धांतों का ऐतिहासिक विश्लेषण: भारतीय संदर्भ में अध्ययन
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Author(s):
MOHINI CHAUDHARY , DR. RAVINDRA SHARMA
Vol - 6, Issue- 11 ,
Page(s) : 91 - 97
(2015 )
DOI : https://doi.org/10.32804/IRJMSH
Abstract
दुनिया की आधी आबादी के लिए यह सबसे बड़ा दिन कहा जा सकता है, जब संयुक्त राष्ट्रमें 1981 में सीडाॅ यानी कन्वेंशन आॅन दी एलिमिनेशन आॅफ आल फाॅम्र्स डिसक्रिमिनेशन अंगेस्ट वूमेन, बमंकंू अर्थात् महिलाओं के विरूद्ध सभी प्रकार के भेदभाव हटाने के लिए संविदा लागू हुई। इसके बाद महिलाओं के अधिकारों में निरन्तर वृद्धि होती रही। भारतीय समाज में पुत्र व पुत्रियों के बीच भेदभाव समाज में प्रारंभ से ही दृष्टिगोचर होने लगता है। लेकिन समय के साथ पुरूषों की सोच के साथ महिलाओं के सोच में भी परिवर्तन आया है। जिससे महिला अधिकारों के साथ महिलाओं की सुरक्षा में भी परिवर्तन आया है। अगर महिला अधिकारों की बात करें तो ऐसे अधिकार या ऐसी स्वाधीनता जिसे करने के लिए महिलाएं किसी के द्वारा परतंत्र न हो अर्थात् महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता की रक्षा करने वाले अधिकारों को महिला अधिकार कहा जाता है। दुनिया की हर सभ्यता और धर्म में स्त्री जाति के प्रति लगभग एक जैसा रवैया है। इज्जत, परम्परा, घर-बच्चे, ईश्वर, शांति एवं विकास आदि के नाम पर उसकी बलि ली जाती है। पिछले कुछ दशकों से स्त्री मुक्ति आंदोलनों के कारण कुछ फि़जा अवश्य बदली है। ये फिजा अब रूकनी नहीं चाहिये।
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