International Research journal of Management Sociology & Humanities
( ISSN 2277 - 9809 (online) ISSN 2348 - 9359 (Print) ) New DOI : 10.32804/IRJMSH
**Need Help in Content editing, Data Analysis.
Adv For Editing Content
संगीत में रस निष्पत्ति के घटक
1 Author(s): DR. (MRS) VANDANA AGARWAL
Vol - 9, Issue- 7 , Page(s) : 196 - 200 (2018 ) DOI : https://doi.org/10.32804/IRJMSH
रस अंतःकरण की निधि है। मनुष्य इसी के गुणानुसार देवत्व या दानत्व को प्राप्त होता है। प्राचीन संगीतकारों ने मानव जीवन को सरस बनाना अपना कर्तव्य समझा और अंतर्निहित रस को वाणी द्वारा एक स्वरूप दिया। “रस्यते इति रस” जिसका स्वाद लिया जाए वह रस कहलाता है। भरत मुनि ने रस की परिभाषा देते हुए ‘नाट्यशास्त्र’ में लिखा है- ‘विभावानुभावसंचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति’, अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा संचारी के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। विभाव के दो भेद हैं- आलम्बन व उद्दीपन। रति आदि स्थाई भाव के आधार नायक-नायिका “आलम्बन” और उसको उद्दीप्त करने वाले चंद्र, चाँदनी, मलय पवन आदि उद्दीपन कहलाते हैं। स्थाई भाव जो अनुभव करते हैं वे अनुभाव कहते हैं। रसावस्थः परभावः स्थापिता प्रति पघतों। जो मात्र रस-अवस्था को प्राप्त होता है वही स्थाई भाव कहा जाता है।
- संगीत दर्शन: विजय लक्ष्मी जैन- कला के सिद्धान्त: आर. सी. कलिंगवुड- सौन्दर्यशास्त्र: डाॅ. नगेन्द्र- कला और संस्कृति: डाॅ. वासुदेवशरण अग्रवाल