International Research journal of Management Sociology & Humanities
( ISSN 2277 - 9809 (online) ISSN 2348 - 9359 (Print) ) New DOI : 10.32804/IRJMSH
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भारत में चुनाव सुधार
1 Author(s): NARENDER KUMAR
Vol - 9, Issue- 6 , Page(s) : 219 - 223 (2018 ) DOI : https://doi.org/10.32804/IRJMSH
चुनाव लोकतंत्र की जीवनी षक्ति है। यह राश्ट्रीय चरित्र का प्रतिबिम्ब होता है। चुनाव की प्रक्रिया गलत होने पर लोकतंत्र की जडे खोखली होती चली जाती है। ऐसा नहीं है कि चुनाव सुधारों को लेकर कोई प्रयास नहीं हुआ है। विष्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का चुनाव निश्पक्ष व षान्तिपूर्वक संचालित करने में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. षेशण ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है और उसके बाद भी यह प्रक्रिया जारी है। सरकार के द्वारा भी समय≤ पर चुनाव सुधारों की कोषिष की गई है। मई 1999 में तैयार गोस्वामी कमेटी रिपोर्ट इस मामले में मील का पत्थर है। दिनेष गोस्वामी की अगुवाई में इस कमेटी में जो रिपोर्ट तैायर की थी। इसमें 107 सिफारिषे थी। इससे पहले 1993 में वोहरा कमेटी भी बनाई गई थी, जिसने ‘राजनीति के अपराधीकरण’ की बात कही थी। चुनाव प्रक्रिया पर संगठित था। असंगठित अपराध के असर को समझने की यह पहली कोषिष थी। 2015 में 20वें विधि आयोग ने ‘इलेक्ट्रोरल टिफार्म’ षीर्शक से अपनी रिपोर्ट सोंपी। आयोग की इस रिपोर्ट में साफ-साफ कहा गया कि चुनाव प्रणाली किया जाना चाहिए। उसकी पूरी जानकारी इस रिपोर्ट में हैं यह राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त करने और गलत हलफनामा दाखिल करने पर उम्मीदवार को अयोग्य ठहराने की वकालत करती है। महिलाओं को मतदान के प्रति जागरूक करने व लोकतंत्र में उनकी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए 2018 में पिंक बूथ की स्थापना की गई जो सिर्फ महिलाओं के लिए बनाया गया है। जहां कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों तक सभी स्तर पर महिला नियुक्त होगी। नोटा व वीवीपेट जैसी व्यवस्था को षामिल करना एक चुनाव सुधारों में मिल का पत्थर साबित हुआ। चुनाव को विकृत करने में सांप्रदायिक भावना और जातीयता की मुख्य कारण रहे है। योग्यता का चिंतन किए बिना धर्म या जाति के आधार पर किया गया। चुनाव उसकी षुद्धि के आगे प्रष्न चिन्ह खड़ा कर देता है। यदि मतदान स्वतंत्र व निश्पक्ष ना हो तो इन हाृस को रोकने के लिए चुनाव - सुधारों हेतु अनेक समितियों व आयोग गठित किए गए है। इन समितियों ने अनेक उपाय सुझाऐं है उनमें से कुछ किया जाना है। कानून अकेले चुनाव व्यवस्था को स्वच्छ नहीं कर सकता सतर्क। जागरूक जनमत की भी आवष्यकता है। लोगों को चुनाव-प्रक्रिया की रूग्णता को विशय में प्रभावग्रहणषील बनाना होगा। जो सुधार पूर्व समितियों व आयोग ने सुझाए है उन्हें ही अधिक षक्ति के साथ धरातल पर लागू करने की जरूरत है ना कि कोई नई समिति / आयोग के गठन की।
1. IGNOU Book Notes2. http://wikipedia.org.com 3 संथानम कमेटी रिपोर्ट 19644. कोठारी, रजनी पाॅलिटिक्स इंडिया (1970)5. वोहरा कमेटी रिपोर्ट (1993)6. सुप्रीम कोर्ट का फैसला (20.03.1997) नैना साहनी के सम्बन्ध में