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Volume -8 Issue - 11
Month [Year] -- November [2017]
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Abstract

With the rate the world's population increasing, the concern will be how we are going to meet everyone's needs with the Earth's slowly diminishing resources.The rapid increase in the world's population is pretty evident when one looks at the numbers.

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Abstract

हिन्दी रीति परम्परा का विकास आचार्य कृपाराम से प्रारम्भ होता है। हिन्दी रीतिकाल में मुगल बादशाहों का बोलबाला था तथा भक्तिकाल का अवसान हो रहा था। मुगलों के समय दरबारी मनोवृत्ति एवं चाटुकारिता बढ गई थी। कविवर्ग अपनी आय का स्त्रोत बढा़ने के लिए दरबारो में शरण लेने लगे थे। इस अवधि में रीतिकाव्य परम्परा का विकास होता रहा। इस युग का सारा काव्य चाटुकारिता एवं उक्तिवैचित्रय से परे नही है। इस काल के काव्यग्रंथो में विलास की मादकता अधिक दिखाई देती है। रीतियुगीन काव्य को शास्त्रीय चिन्तन दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में देखने से यह स्पष्ट होता है कि इस बात में अलंकार-निरूपण, रस एवं नायक-नायिका भेद निरूपण एवं सर्वांग निरूपक ग्रंथो की रचनाएँ हुई। इन शास्त्रीय कवियो में ऐसे कवि भी हैं, जिन्होने अप्पयदीक्षित और जयदेव के आधार मानकर अलंकार निरूपण किया है। इस श्रेणी के कवियो में केशवदास, जसवन्त सिंह, मतिराम, भूषण, सुरूति मिश्र आदि है। नायक-नायिका भेद निरूपण करने वालो में मुख्यतः आचार्य कृपाराम, सूरदास, रहीम, नंददास, चिन्तामणि आदि प्रमुख हैं। सर्वांग निरूपक कवियो में केशवदास, कुलपति मिश्र, सूरति मिश्र, श्रीपति, सोमनाथ, भिखारीदास, जगत सिंह, ग्वाल आदि की गणना की जा सकती है। इसी प्रकार से हिन्दी रीति परम्परा में भिखारीदास का स्थान इस प्रकार से देखा जा सकता है।

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Abstract

The Indian government’s ‘Make in India’ campaign and the accelerated growth in the economy has highlighted the demand for skilled manpower in the country. The objective of this article to understand the current state of vocational education and training and review the vocational training models of the emerging economies.

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Abstract

स्वतन्त्रता के पश्चात् सरकार ने भारत के स्तर को ऊॅचा उठाने एवं लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए कई कानून बनाये गये परन्तु भारतीय शैक्षिक व्यवस्था वर्तमान समय तक सामाजिक परिस्थितियों क अनुरूप नहीं ढल पायी है जिसे अपने अनुरूप बनाने के लिये समय समय पर आयोग व समितियों का गठन होता रहा है एवं परिस्थिति अनुरूप् उसका क्रियान्वयन भी किया जाता रहा है।

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Abstract

समावेशी षिक्षा से तात्पर्य ऐसी षिक्षा प्रणाली से है, जिसमें प्रत्येक बालक को चाहे वह पिछड़ा हो या सामान्य या फिर विषिष्ट, बिना किसी भेदभाव के, एक साथ एक ही विद्यालय में, सभी आवष्यक तकनीकों व सामग्रियों के साथ, उनकी सीखने-सिखाने की जरूरतों को पूरा किया जाये। समावेषी षिक्षा कक्षा में विविधताओं को स्वीकार करने की एक मनोवृत्ति है जिसके अन्तर्गत विविध क्षमताओं वाले बालक सामान्य षिक्षा प्रणाली में एक साथ अध्ययन करते हैं। इसके अनुसार प्रत्येक बालक अद्वितीय है और उसे अपने सहपाठियों की तरह कक्षा में विविध प्रकार के षिक्षण की आवष्यकता हो सकती है। बालक के पीछे रह जाने पर उसे दोषी नहीं ठहराया जाता है, बल्कि उसे कक्षा में भली-भाँति समाहित न कर पाने पर षिक्षक की जबाव देही सुनिष्चित की जाती है। जिस प्रकार हमारा संविधान किसी भी आधार पर किये जाने वाले भेदभाव का निषेध करता है, उसी प्रकार समावेषी षिक्षा विभिन्न ज्ञानेद्रिय, शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक आदि कारणों से उत्पन्न किसी बालक की विषिष्ट शैक्षिक आवष्यकताओं के बावजूद उस बालक को अन्य बालकों से भिन्न न देखकर उसे एक स्वतंत्र अधिवासकत्र्ता के रूप में देखती है। वस्तुतः समावेषी षिक्षा प्रणाली के सभी बालक, पिछड़े हो या सामान्य व विषिष्ट, एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर एक ही विद्यालय में षिक्षा ग्रहण करते हैं। शब्दावली: समावेषी षिक्षा, पिछड़ा बलाक, मनोवृत्ति, ज्ञानेद्रिय, बौद्धिक, अधिवासकत्र्ता ‘पिछड़ापन’ विद्यालयों की अति गूढ़ व जटिल समस्या है। इस समस्या को अधिकतर अध्यापक हल करने का प्रयत्न नहीं करते। वे यह कहकर कि बालक ‘पिछड़ा’ है समस्या का अन्त कर देते हैं। यह उचित ढंग नहीं है क्योंकि यह तो हो सकता है कि पिछड़ेपन का करण बालक की मंदबुद्धि हो सकती है, किन्तु यदि हम प्रत्येक पिछड़े बालक की विषेषता मन्दबुद्धि ही समझे तो यह भ्रमात्मक है क्योंकि पिछड़ेपन के अन्य बहुत से कारण हो सकते हैं। षिक्षा के संदर्भ में पिछड़े बालक वे होते हैं जो किसी तथ्य को बार-बार समझाने के बावजूद नहीं समझते व औसत बालकों के समान प्रगति नहीं कर पाते। ये पढ़ने-लिखने में कमजोर होते हैं व कई बार असफल होते हैं किन्तु सभी पिछड़े बालक मंदबुद्धि नहीं होते हैं यद्यपि मानसिक रुप से निरूद्ध सभी बालक शैक्षिक पिछड़ेपन के षिकार होते हैं किन्तु अनेक सामान्य बुद्धि के बालक भी शैक्षिक प्रगति में पिछड़ जाते हैं बर्ट ने लिखा है - ‘‘पिछड़ा बालक वह है जो अपने स्कूल जीवन के मध्यकाल में अपनी कक्षा से नीचे की कक्षा का कार्य नहीं कर सकता, जो कि उसकी आयु के लिए सामान्य कार्य है।’’

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Abstract

Around the world, children are excluded from schools where they belong because of disability, race, language, religion, gender, and poverty and India is no exception. But every child has the right to be supported by their parents and community to grow, learn, and develop in the early years, and, upon reaching school age, to go to school and be welcomed and included by teachers and peers alike. When all children, regardless of their differences, are educated together, everyone benefits—this is the cornerstone of inclusive education. India is a country with abundant human capital. This important human resource should be tended properly through education and training to engage it successfully in the nation building activity. But unfortunately, more than half of our children are out of the school system due to various reasons. This is in violation to Human Rights issue which stresses upon upholding human dignity. The main goal of Right to Education Act and Inclusive Education is making education available to each child irrespective of his location, class, caste, religion, status and standing mental and physical limitations and other disadvantages the child may be suffering from. There are number of initiatives taken in pursuance of this objective such as The Indian Education Commission (1964-66), Integrated education for Disabled Children (IEDC, 1974), National Policy on Education (NPE, 1986-92), Project Integrated Education for the Disabled (PIED, 1987), District Primary Education Program (DPEP, 1994), The Persons with Disabilities Act, 1995.

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Abstract

In the modern era, organizations are facing several challenges due to the dynamic nature of environment. One of the many challenges for a business is to satisfy it’s employees in order to cope up with the ever changing and evolving environment and to achieve success and remain in competition.In order to increase efficiency, effectiveness, productivity and job commitment of employees, the business must satisfy the needs of it’s employees by providing good working conditions. The objective of this paper is to analyse the impact of working environment on employee job satisfaction. It is essential for an organization to motivate their employees to work hard for achieving the organizational goals and objectives.

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Abstract

पुरुष द्वारा संचालित समाज में स्त्री सर्वाधिक उपेक्षित और दमित है जिसे हमेशा लिंग की दृष्टि से हाशिये पर धकेल दिया गया है।दुनिया की बेहतरीन सृष्टि होकर भी अपने अस्तित्व के लिए सतत संघर्ष करना उसकी नियती बन गयी है।पुरुष की वर्चस्ववादी मानसिकता के कारणअपने अधिकारों से वंचित होकर समाज के दायरे में खडे होने के लिए वह विवश है।उसकी गुलामी की यह दास्तान सदियों पुरानी है जिसका देश व काल जैसा कोई बंधन नहीं है।यानी समय,स्थान और चेहरे ही बदलते हैं पर उसकी दासता की कहानी कभी नहीं बदलती।आज शिक्षा और कानून से उसकी हालत काफ़ी सुधर गयी है।फिर भी अपने ऊपर पडी बेडियों को काट डालने में वह पूरी तरह सक्षम नहीं हुई है।

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Abstract

लोक कला हमारे प्रतिदिन के जीवन के विभिन्न रूपों में गुथी है । यह कला शास्त्रीय बंधनों से मुक्त होती है । इसकी ऐतिहासिक कला परम्परा का अपना अलग ही स्वरूप है । लोककला धार्मिक भावनाओं और आध्यात्मिक अनुभवों पर विशेष आधारित है ।१ इसमें मूल सांस्कृतिक विशेषताओं एवं मौलिक परम्पराओं का परित्याग नहीं किया जाता है, बल्कि नव चेतना का वास इसके अन्त:करण में यथावत् रहता है । लोक मानस सृजन परम्परा एवं संस्कृति की मूल भावनाओं से सदा ओतप्रोत रहा है ।